शनिवार, 8 सितंबर 2012

जीना सिखाया मुझको मेरी आंखो ने






          जीना सिखाया मुझको मेरी इन प्यारी आँखों ने 


इक रिश्ता बनाया इन आँखों ने

मुझे दिल तक पहुचाया इन आँखों ने

किसी को चाहना किसे कहते है
ये भी सिखलाया इन आँखों ने

है शर्म हया का गहना ये

पलकों से बताया आँखों ने

कुछ राज छुपाये आँखों ने

हमे प्यार सिखाया आँखों ने

मैं याद करूँ उन सपनों को जिन्हें दिल में बसाया आँखों ने

मैं याद करूँ उन सपनों को जिन्हें सच कर दिखाया इन आँखों ने

होंठ तो अब तक हिले न थे हाथ हाथ से मिले न थे

चुपके से सब समझाया इन आँखों ने

धड़कन के साज़ बस बजे ही थे

साँसों की लय संग रचे ही थे

प्यार का सुन्दर गीत बनाया इन आँखों ने

इन आँखों का अब क्या कहना बस
इनमे दिल के है राज बसे

जो है अनजान सभी जन से

इन आँखों में वो ख्वाब सजे जो पूरा करदे साईं अगर

जीवन मेरा हो जाये सफल बस इतना ही में कहती हूँ

जीना सिखाया मुझको मेरी इन प्यारी आँखों ने .




ankhe

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

बच्चो के बिगड़ने में उत्तरदायी कौन?

आजकल बच्चे बिगड रहे हैं,परन्तु इसके लिए उत्तरदायी कौन है ?
वर्तमान युग में यदि ये कहा जाय कि हम अपने परिवार ,समाज और देश का भविष्य ही अंधकारमय बना रहे हैं ,तो प्रथम दृष्टया उस पर विश्वास नहीं करेंगें ,परन्तु आज का यथार्थ यही है.ऐसा कहने के पीछे मेरी धारणा यह है कि बच्चे हमारा कल हैं,उन्ही पर हमारा ,परिवार ,समाज और राष्ट्र का भविष्य टिका है,परन्तु आज हम उनका उज्जवल भविष्य उनको भौतिक रूप से समृद्ध और कमाऊ संतान के रूप में ही निर्धारित करना चाहते हैं. अधिकांश परिवारों में आज क्या स्थिति है, देखते हैं……………
हम किसी परिचित परिवार में बैठे थे,टी वी पर कोई कार्यक्रम आ रहा था जिसका आनन्द सभी लोग ले रहे थे,इतनी देर में उनका छोटा बच्चा जिसकी आयु लगभग 10-11 वर्ष थी,आया रिमोट उठाया और तुरंत चैनल बदल दिया .बच्चे के बाबा ने कुछ अनिच्छा प्रकट की क्योंकि वो कोई पारिवारिक कार्यक्रम था . इसी समय बच्चे के पिता ने बड़े गर्व से कहा ,सुनता ही नहीं ,इसके सामने कोई और टी वी देख ही नहीं सकता.थोडा सा बज़ट का प्रबंध हो जाय ,हम तो सोच रहे हैं इसके कमरे में एक टी वी अलग ही लगवा दें,परन्तु इसका कहना है कि इसको एल ई डी ही चाहिए ,अब उसके लिए तो और प्रबंध करना होगा.मैंने उनसे कहा अभी तो छोटा है अलग टी वी कुछ जरूरी नहीं ,परन्तु बच्चे की माँ तुरंत बोलीं “नहीं जी, आजकल तो इनसे भी छोटे छोटे बच्चों के कमरे में अलग टी वी ,कंप्यूटर आदि सब कुछ रहता है ,ये बहुत दिन से जिद्द कर रहा है,अब तो लगवाना ही पड़ेगा.”बच्चों के मन में ये बात आ जाती है कि हमारे मम्मी पापा हमें प्यार नहीं करते.”
सुझाव वहाँ देना चाहिए,जहाँ उसकी उपयोगिता हो ,या कोई सुनने की इच्छा रखता हो , यही सोचते हुए हम लोग थोड़ी देर बैठकर अपने घर आ गए.मन ही मन मैं सोच रही थी एक मध्यम वर्गीय परिवार जो अपने लिए भले ही आवश्यकता या सुख सुविधा की वस्तुएँ जुटाने में वर्षों बिता दे परन्तु बच्चे को समस्त भौतिक सुख सुविधा अपनी चादर से पैर बाहर निकल कर भी देना चाहता है,परन्तु क्या ये उचित है? आज अपवाद स्वरूप कुछ परिवारों को छोड़ दें तो व्यवहारिक स्थिति यही है.
एक ओर तो कहा जाता है ,आजकल बच्चे बिगड रहे हैं ,स्वार्थ बढ़ रहा है उनमें ,सुनते नहीं ,बड़ों का सम्मान नहीं करते ,संस्कार टूट रहे हैं,बच्चों के खर्चे बढ़ रहे हैं आदि …………….परन्तु इसके लिए उत्तरदायी कौन है ?

दिखावे के प्रयास में अपनी जड़ों को छोड़ते हुए कुछ अधिक ही आगे बढ़ गए हैं.यही कारण है कि आज हम खुलेपन का समर्थन करते हुए बच्चों के सामने झूठ सच,नैतिक अनैतिक सभी तरह का व्यवहार करते हैं,अश्लील फ़िल्में,धारावाहिक ,अन्य कार्यक्रम बच्चों को दिखाते हैं जहाँ से बच्चे का अपरिपक्व मस्तिष्क सकारात्मक नहीं केवल नकारात्मक ही सीखता है.आज बच्चे हिंसक हो रहे हैं,गाली गलौज की भाषा का प्रयोग करते हैं ,हम उन को रोकते नहीं क्योंकि अब वो ही हमारी दृष्टि में आधुनिकता की पहिचान है. बच्चे को लालच अंकल चिप्स ,कोल्ड ड्रिंक,चौकलेट और पिज्जा का दिया जाता है,ये जानते हुए भी कि हम बच्चे के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. दूसरे शब्दों में बच्चे के मुख से निकली उचित अनुचित सभी मांगों को पूर्ण करना ! ऐसा लगता है कि हम भी तुष्टिकरण की नीति को अपनाने के आदि हो रहे हैं.आज बच्चे को पैसे का मूल्य समझने ही नहीं दिया जाता.एक या डेढ़ वर्ष की बच्ची को टी वी के आगे बैठाकर ,माँ बड़े गर्व से कहती हैं ,टी वी बंद नहीं करने देती ,रोती है यदि बंद करें तो .
पहले भी बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए उनकी मांगें पूर्ण की जाती थी,लालच दिया जाता था,परन्तु कहानी सुनाना,घुमा कर लाना,बच्चों की गुल्लक में पैसे डालना ,उनको उनकी रूचि का कोई खिलौना अपनी जेब के अनुसार दिलाना,उनकी रूचि के व्यंजन बनाकर खिलाना आदि आदि ..
मेरा मानना है कि बच्चों की मांग पूर्ण अवश्य की जाएँ परन्तु एक सीमा तक ,बच्चों को अपनी परिस्थिति बताकर कुछ समझ को विकसित करने का कार्य किया जाय..आज की माँ परेशान हो कर ये तो कहती हैं कि हमारा बच्चा खाना नहीं खाना चाहता ,परन्तु ये भूल रही हैं कि इस समस्या का समाधान डाक्टर के पास नहीं स्वयं उनके पास है.उनको भोजन पहले कराईये , यदि पसंद की कोई वस्तु देनी भी है तो भोजन के बाद .उनकी शिक्षिका से बात करिये .बच्चे माता-पिता से अधिक टीचर की बात सुनते हैं,विद्यालयों में औपचारिकता के लिए ये तो कहा जाता है कि घर से भोजन दें बच्चों को ,परन्तु बच्चे वो भोजन कर रहे हैं ,भूखे रहते हैं ये देखने का समय किसी शिक्षक या शिक्षिका के पास नहीं.यही कारण है कि आज बच्चे मोटापे का शिकार हो कर बचपन से हो मधुमेह और घातक रोगों से ग्रस्त होने लगे हैं.न तो उनके लिए शरीर का व्यायाम कराने वाले खेल कूद हैं ,न ही पौष्टिक भोजन .टी वी, इंटरनेट,वीडियो गेम्स,मोबाइल ही उनका मनोरंजन है.इनके विषय में जानकारी होना अनुचित नहीं अनुचित है इन साधनों का दीवाना बनाना .
बच्चों से सम्बन्धित एक समस्या जिसके कारण उनको भी तनाव रहता है और उनकी माँ को विशेष रूप से ,वो है शिक्षा की दूषित प्रणाली .आज बच्चे ज्ञानवान कम रट्टू तोता अधिक बन रहे हैं,प्रोजेक्ट वर्क के नाम पर माएं उनके कार्य पूर्ण करती हैं,और पढ़ाई के लिए ट्यूटर के पास भागना उनकी विवशता है.
आज यदि ऐसे माता पिता को हम खोजने लगें जो बच्चे को राष्ट्र प्रेम से सम्बन्धित कुछ तथ्य बताते हों, ,महापुरुषों के प्रेरक प्रसंग सुनते हों ,राष्ट्रीय पर्वों पर बच्चों को विद्यालय जाने के लिए प्रोत्साहित करते हों तो बिरले ही मिलेंगें.
यदि माँ स्वयं टी वी के भद्दे,समाज को गलत दिशा में निर्देशित करने वाले कार्यक्रम देख कर आनन्दित हैं,सब काम धाम छोड़ कर टी वी से चिपकती हैं तो बच्चों से कैसे आशा की जा सकती है कि वो दूर रह सकेंगें. टी वी कार्यक्रमों को दोष देना समस्या का हल नहीं क्योंकि टी वी के कार्यक्रमों की टी आर पी ही निर्माताओं को ऐसे कार्यक्रम परोसने को प्रेरित करती है.पिता शराब ,गुटके, सिगरेट का सेवन करते हुए बच्चों से झूठ सच बोलते हैं,रिश्वत या भ्रष्ट उपायों से घर की भौतिक समृद्धि को बढाना चाहते हैं,आपसी लड़ाई में बच्चों को मोहरा बनाते हैं,अपने मातापिता का सम्मान नहीं करते हैं, तो बच्चों का भविष्य उज्जवल नहीं बना सकते.
बच्चों के माध्यम से अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करना अनुचित तो नहीं परन्तु उनके भविष्य के ,उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना तो अक्षम्य है..यदि हम देश ,समाज या स्वयं अपने बच्चे और परिवार का हित चाहते हैं तो अपनी सोच को को बदलना ही होगा. 
 नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के इस वाक्य का महत्व समझना होगा ,यदि मुझको सौ माताएं मिल जाएँ तो एक शक्तिशाली और स्वर्णिम राष्ट्र का निर्माण हो जाये
                 

पेड कहे इन्सान से तू क्या काटे मोये


पेड कहे इन्सान से तू क्या काटे मोये


पेड कहे इन्सान से तू क्या काटे मोये
एक दिन ऐसा आयेगा न में रहूँगा न तोये
है अब हाथ हमारे ही खुद को लेई बचाए
पेड लगाये हर तरफ खुशियों की राह बनाये
धरती के बंजर रूप को फिर से हम सब मिल सजाये
कोई भी कष्ट न रहे धरती भी इठलाये,
पक्षियों को भी मिले सुरक्षा और घरोंदा
विलोपित होती प्रजातिया पक्षियों की
हम सुरक्षित रख पाए देश की खुशाली में
ये पहला कदम हम सब मिलके साथ उठाये
ओजोन की जो परत घट रही उस पर रोक लगाये
बडती गर्मी और बीमारी से दुनिया को आज बचाए
आओ सुरक्षित धरती की नीव मिल हम सब आज सजाये

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

रिश्ते जीवन में सबसे अनमोल होते है


रिश्ते जीवन में सबसे अनमोल होते है /

हमारे अस्तित्व की वही पहचान होते है /

हम रिश्तो में नहीं जीते रिश्ते हम में जीते है

तभी तो प्यार और सम्मान की डोरे से बंधे रहते है /

जीवन में जब भी कोई ख़ुशी की घड़ी आती है

पुरानी यादो में बसी रिश्तो की लड़ी

आँखों के सामने चलचित्र सी छा जाती है
रिश्ते भी पंछियों की तरह होते हैं,

प्यार और सम्मान हो तो यादो का घरोंदा सजाते है

नहीं तो पंछी की तरह बिना रुके आगे बड़ जाते है,
अगर रिश्तो की डोर आप सख्ती से पकड़ते हैं
तो रिश्ते भी पंछी की तरह बिना प्यार मर जाते हैं,

अगर रिश्तो की डोर हम बिना समझ नम्रता से पकड़ते हैं
तो वो भी पंछी की तरह उड़ हमारे जीवन से दुर कही खो जाते हैं,
लेकिन अगर हम उन्हें हिफाज़त से पकड़ते हैं

प्यार सम्मान और आपसी विशबास के धागों में जकड़ते है
तो हमारे साथ हमेशा के लिए रह जाते हैं ♥

प्यार की खुशबू से हमारे आंगन में सदा

खुशाली का मधुर संगीत गुनगुनाते है

रिश्ते अपनी अहमियत से हमको खुद हर पल रूबरू कराते है
         

रविवार, 2 सितंबर 2012

सच में प्यार ऐसा ही होता है?

क्या सच में प्यार ऐसा ही होता है ?


 मेरा आज का विषय है प्यार,प्रेम,या यु कह लीजिये वर्तमान की भाषा में लव ,मेरे मन मे काफी समय से ये सवाल उठ रहा था की क्या शादी के बाद भी प्यार संभव है ,और यदि हां तो वो किस तरह का प्रेम होता है.आजकल कुछ अनोखी बाते सुनने को मिलते है कि फलाना औरत अपने बच्चो को छोड़कर किसी के साथ भाग गई या किसी आदमी ने अपनी पहली पत्नी को छोड़कर किसी और से शादी कर ली .आज के इस आधुनिक और प्रगतिशील युग में प्यार के मायने ही बदल गये है .जाहा कभी हम शीरीं फरहान कि बात करते थे या लैला मजनू के किस्से सुनते थे .जहा प्यार एक निस्वार्थ और त्याग कि भावना से वशीभूत होता था आज वही यही प्यार त्याग करता नही दुसरे से त्याग मांगता है.कि हमने प्यार किया है और अब आप इसकी सजा भुगतो.मेरे एक सहेली के लिए कुछ डिवोर्स रिश्ते आये है जब डिवोर्स का कारन पुछा तो पता चला की लड़की किसी और से प्यार करती थी पर पापा का दिल रखने के लिए चुप चाप शादी कर ली पर बाद में मौका और प्लानिंग के साथ अपने प्यार को अपना लिया इनसे जाना जाये की उस लड़के ने आपका क्या बिगाड़ा जो उसकी लाइफ अपने प्यार के खेल में आपने बर्बाद कर दी /इसी तरह कुछ लड़के माँ पापा के सामने बोल नहीं पाते की उन्हें लड़की पसंद नहीं या वो किसी और से प्यार करते है पहले तो घर के दवाब में आ कर शादी कर लेता है फेर उस मासूम लड़की को समय समय पर insult सहने को मजबूर कर देता है ऐसी लडकिया या तो depression में चली जाती है या suicide करती है या प्यार की साजिश में बलि चढ़ जाती है पता नहीं ये कैसा प्यार है प्यार करने वालो के दिल में दया और डर दोनों के लिए मोर्डेन समाज में जगह नहीं /
प्यार तो दो आत्माओ के मिलन का नाम है.पर आज के इंसान का किसी एक आत्मा से तो मन भरता ही नही .क्या समय बदलने के साथ साथ आज प्यार भी बदल गया है.प्यार को पूजा का नाम दिया जाता था.पर आज तो यही पूजा आपको गली के हर कोने पर ,नुक्कड़ पर ,पार्क में ,रेस्टोरंट में,घर मे,स्कूल में ,कालिज में ..या ये कह लीजिये कि हर जगह देखने को मिल जाएगी.पहले कभी कभी प्यार के किस्से सुनने को मिलते थे. पर आज तो मानो जैसे सबको ही प्यार का बुखार हो गया है यहाँ तक की लोग नेट पर भी एक नहीं हजारो लडकियों को झूठे प्यार के सपने दिखायेगे emotional खुद की कोई दुःख भरी कहानी सुना अपनी तरफ आकर्षित करेगे फेर उन लडकियों के फीलिंग से धीरे धीरे आपने male ego को हर तरीके से एन्जॉय कर रोने के लिए छोड एक नयी लड़की की तलाश में लग जायेगे,ये फितरत कुछ लडको की ही नहीं लडकियों की भी है यहाँ social साईट पर ये कड़वा सच मैंने अपनी ही कुछ अच्छी नेट फ्रेंड से समझा यकीं मानिये बहुत दुःख हुआ और प्यार जैसे शब्द पर विशबास नहीं रहा और मेरा दिल बोला ..क्या सच में प्यार ऐसा ही होता
है ?
नही…प्यार तो निस्वार्थ ,सच्चा और सामने वाले के लिए कुछ भी कर गुजरने का नाम है.प्यार तो शायद ईश्वर कि स्तुति का दूसरा नाम है .आज का प्यार केवल शारीरिक सुख और तोहफों या गिफ्ट का मोहताज़ रह गया है.आज प्यार मन से नही..तन से.कपड़ो से,पैसे से,या फिर इस दोड़ती भागती ज़िन्दगी में से कुछ पल सुकून के ढूंढने का नाम रह गया है .आज सब लोग प्यार कि तलाश में घर से बाहर जाते है .पहले इश्क के लिए घर से बाहर जाना जरुरी नही था न ही बालो में हेयर जेल लगाना जरूरी था और न ही लड़कियों को तंग या उघडे कपडे पहनना जरूरी था ..अब प्यार केवल इन में ही सिमट कर रह गया हे..अब प्यार केवल काम-वासना कि तृप्ति का साधन बन कर रह गया है /
.हो सकता है कि आज के युग में भी सच्चे प्रेमी हो जो सचमुच एक दुसरे से प्यार करते हो …जिनका प्यार रोजमर्रा कि जरूरतों से कही उपर हो …पर आज के माहौल को देख क्या वो एक दुसरे की फीलिंग को समझ पायेगे क्या विशबास करेगे शायद हाँ /न ,मगर ५०% लव स्टोरी आज सिर्फ टाइम पास बन कर रह गई है ..अगर आपने सामने वाले का जवाब प्यार से नही दिया तो प्यार खत्म ..और पहले के जमाने में प्यार एक से होता था और अब तो अनेक से होता है…ये इश्क,प्यार ,लव,मोहब्बत नही है ये केवल एक का दुसरे के प्रति मायावी खिचाव है …और कुछ नहीं…