पिछले साल एमबीए इन फाइनेंस करने के बाद बेटी की जाब एक एमएनसी में लगी तो सबको बहुत खुशी हुई। उसे फिलहाल सबकी तरह वर्क फ्राम होम मिला, यानि कि बच्चे घर से काम कर रहे हैं तो मां बाप को सुकून कि बच्चे के पास जाब है और वो नज़रों में सामने भी, लेकिन लोकेशन तो कभी ना कभी ज्वाइन करनी ही थी और अब वो वक्त भी आ गया।
पैंडमिक के बाद जैसे जैसे सब खुलता जा रहा है सब अपने अपने मोर्चे पर डटने को तैयार खड़े हैं कालेज वाले कालेज और जाब करने वाले अपनी लोकेशन के लिए तैयार हैं। ये सब पार्ट आफ वर्क है लेकिन असल दिक्कत तब आती है जब शहर दूर हो और मामला बेटी का हो, एक तरफ़ उसका सुनहरा भविष्य वेलकम को तैयार हो लेकिन उस वेलकम का इस्तक़बाल करने में कुछ मुश्किलें भी आड़े आ रही हों।
अनजान शहर में एक हर लिहाज़ से अच्छा ठिकाना ढूंढना भी एक पज़ल गेम है। एक सौ बीस घंटे की छुट्टी लेकर निकले कि सारे काम अड़तालिस घंटे में निबटा कर बाक़ी के बाहत्तर घंटे घूमेंगे पयर्टन का लुत्फ़ लेंगे लेकिन साठ घंटे निकल चुके थे लेकिन परफेक्ट ठिकाना नहीं मिल पाया था इसलिए हमारा घूमना किनारे हो गया क्योंकि दिमाग़ ने घूमना शुरू कर दिया था।
बेटी के दूर शहर में बसने की वजह से इधर पत्नी की नम आंखें और उदास चेहरा, उधर घर में सन्नाटा हो जाने की वज़ह से माता जी का रूंधे गले से हमें डांट कर कहना "कि कोई नौकरी नहीं करानी है हमको, बेटे को भी बाहर पढ़ने भेज दिया और बेटी को भी इतनी दूर भेजने को तुम राज़ी कैसे हो गये तुम उसे लेकर वापस आ जाओ"।
इन दोनों को उदास देखकर मेरा भी मन उदास हो उठा कि तभी ईश्वर की मेहर हुई और एक लिंक मिला जिसने पिन प्वाइंट पर काम किया। दरअसल मेरी एक सिस्टर श्वेता जो वहीं रहती है पर इत्तेफ़ाक़न कभी मिलना नहीं हुआ ये बात जब उस तक पहुंची तो वो और उसके पति ने तुरंत एक्शन में आते हुए खुद ही मुझे काल करके संपर्क किया और कहा "भईया आप परेशान मत हों हम लोग देखते हैं क्या बेस्ट हो सकता है, बाक़ी ईश्वर है", फिर उन्होंने अपनी पड़ोसी प्रीति से संपर्क किया जो रह तो इस वक्त हैदराबाद में रही हैं, पर फिलवक्त अपने फ्लैट के रेंट आऊट एग्रीमेंट के सिलसिले में इन दिनों आयी हुई थीं। प्रीति ने अपनी पहचान के कुछ लोगों और ब्रोकर से बात शेयर की।
जो काम पिछले साठ घंटे से टेंशन दे रहा था वो अगले छह घंटे में मन मुताबिक सार्ट आउट होकर डन हो गया। हमने राहत की सांस ली और ईश्वर के साथ साथ सभी को, जिन्होंने भी इस काम को अपना समझकर हमें सपोर्ट किया उन सभी को धन्यवाद दिया ।
अब बारी थी माता जी पिता जी को समझाने की पर वो समझे कितना ये तो पता नहीं पर चेहरे पर उदासी पढ़ी जा सकती है।
इधर पत्नी तो पिछले एक महीने से जबसे टिकट बुक हुई है उसके आंसू बाहर ही रखे रहते हैं, मां आखिर मां होती है वो धीरे धीरे ही नार्मल मोड में आयेगी,जब उसको यकीन हो जाएगा कि वो बेटी जो अभी तक घर भर की गुड़िया बनी हुई थी अब बड़ी हो गई है और अपनी पहचान बनाते हुए वेल सेटेल्ड है और अपनी कामयाबी से जब बच्चे खुश होते हैं तो मां बाप दूर रहते हुए भी खुशी महसूस करते हैं।
हां इन सबके बीच मेरी ज़िम्मेदारी पिता होने के नाते काफ़ी बढ़ गई है यद्यपि दिल दिमाग़ मेरा भी उधर ही लगा हुआ है, पर जीवन में ये पड़ाव हर उस माता पिता के सामने आता है जो चाहते हैं उसके बच्चे अच्छी तालीम लेकर ऊंचा मक़ाम हासिल करें और अपने कैरियर की बुलंदियों को छुयें।
बच्चों को किसी तरह की कोई दिक्कत ना महसूस हो और हमारे पैरेंट्स और पत्नी भी प्रसन्न मुद्रा में रहें ऐसी ईश्वर से प्रार्थना है। ईश्वर सब अच्छा करेंगे और उनकी मेहर सदा की तरह बनी रहेगी इस उम्मीद और विश्वास के साथ कि..…
ये सच है कि बिन हौसलों के ऊंची कोई उड़ान नहीं होती
लौट जायें गर परिंदे यूं ही बिन उड़े फिर कोई पहचान नहीं होती
जीतना है आसमां को तो पंख में हौसलों का दम भरना ही होगा
दिख रही हो सामने मंजिल अगर फिर कोई भी थकान नहीं होती।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें