मंगलवार, 8 नवंबर 2011

बड़ते रहना ही ज़िन्दगी है


समुंदर  की  गहरइयो  से  उठकर ,

एक  लहर  आगे  बड़ रही  थी ,
जाने  कितनी  उमंगे  कितना  जोश  लिए ,
हर बार  उठना गिरना ,और  गिर  कर फिर से  उठना ,
न  जाने  कितनी  ही  छोटी  छोटी  लहरों  को  अपने  अंदर  समाये  हुए,
वो  लहर  आगे  बड़  रही  थी ,

हर  बार  वही  चंचलता  वही  जोश ,
हर  लहर  में  वही  ख़ुशी  की  आवाजे  थी ,
आगे  बड़ते  जाना  और  साथ  साथ  चलते  हुए  ,
एक  अनदेखे  किनारे  को  पाने  की  उमंग  थी न  जाने  कितने  ही  सपने  सजोये  हुए
वो  लहर  आगे  बड़   रही  थी

हवा  का  रुख  साथ  था  और ,ऊपर  खुला  साफ़   आकाश  था ,
पर  शायद   सब  कुछ  इतना  आसान नहीं  था ,
आगे  एक  चटान थी  ,लहर  फिर भी  आगे  बदती  गयी  ,
एक  तेज़   आवाज  बहुत  से  बूंदे  उड़ये,
लहर  दो  अलग  अलग  हिस्सों  में  बट गयी
एक  चटान  के   इस   किनारे  दूसरी  चटान   के  उस  किनारे

अब  रफ़्तार  कम  थी  लहर  कम   उठ  रही  थी शायद   साथ  छुटने  का  गम  था ,
लेकिन  लहर  आगे  बड़   रही  थी 
विश्वास  पक्का  हो  तो  इरादे  सफल  हो  जाते  है
जो  छुट जाये  वो  फिर  मिल  जाते  है
लहर  को  भी  पूरा   विश्वास था
रास्ता  मुश्किल  था ,मगर  हौसला  साथ  था

चटान  का  फिर  दूसरा  किनारा  आ  पहुचा,
एक  बार  फिर  कुछ  आवाजे  आयी,
पर  इस  बार  बात अलग  थी ,
दोनों  लहरें  फिर मिल  गयी  ,
साथ  में  बहुत  सी  नयी   लहरें  भी  जुड़  गयी थी

मानो जशन मानाने  आयी  थी ,
फिर एक  वही  साथ  था ,
वही  ख़ुशी  वही  उमंगो  का  आसमाँ था
वही  हंसी  और  अब  आज  अभी   फिर  से  वो  लहर  आगे  बड़  चली .

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