नये ज़माने के रंग में पुरानी सी लगती है जो,
आगे बढने वालों के बीच, पिछङी सी लगती है ,
जो गिर जाने पर मेरे, दर्द से सिहर जाती है ,
जो चश्मे के पीछे आँखें गढाए हर चेहरे में मुझे निहारती है,
जो खिङकी के पीछे टकटकी लगाए मेरा इन्तजार करती है,
जो... सुई में धागा डालने के लिये हर बार मेरी मनुहार करती है ,
जो तवे से उतरे हुए गरम फुल्कों में जाने कितना स्वाद भर देती है,
वो मेरी माँ, हाँ मेरी माँ ही तो है वो//
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