सोमवार, 6 अगस्त 2012

दहेज एक श्राप है समाज का

कोई टोपी, तो कोई अपनी पगड़ी, बेच देता है........
मिले गर भाव अच्छा, जज भी कुर्सी बेच देता है......

जला दी जाती है ससुराल मेँ, अक्सर वही बेटी...
जिस बेटी की ख़ातिर, बाप अपनी किडनी बेच देता है...

आज दहेज़ एक बहुत बड़ी कृति बन करसामने आए है और कही न कही समाज के लड़के पक्ष ही नहीं लड़की पक्ष भी इसका जिम्मेदार है /जो इन्सान (पिता) अपनी बेटी को पड़ा लिखा कर काबिल बनता है वो उसके भाग्य और क़ाबलियत पर भरोसा नहीं कर पाते उनको लगता है की जीवनसाथी के बिना वो कैसे जीवन काट पायेगी /
अपने उसको  इस काबिल बनाया है की वो जीवन के हर संघर्ष का सामना करने के लिए सक्षम है इसलिए शादी जरूर करे पर साथी सर्च करने में जल्दी न करे और दहेज़ के लालचियो को बिलकुल कबूल न करे जो इन्सान आपकी लड़की को उसकी क़ाबलियत पर नहीं बल्कि इस बूते पर अपनाते है की वो साथ में कितना पैसा लातीहै वो कभी उसको दिल से प्यार नहीं दे सकता है क्योकि उसके आँखों पर तो पैसे की पट्टी बंधी है//
बेटी उसको दीजिये जो आपकी बेटी को प्यार विशबास दे जो उसकी क़ाबलियत को समझे और फेर जो बिन मांगे शादी करे उसको अपने दिल से जो अपने अपनी बेटी के लिए सोचा है वो दे कर सारे अरमान आप पूरे करे "क्योकि बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भिक "कहावत किसी बिधवन ने लिखी है और अगर हम अमल करेगे तो अपनी बेटी का भविष्य तो सुधरेगी साथ साथ इस दहेज़ रुपी बीमारी को भी समाप्त करने में अपना योगदान दे पायेगे .

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